गोपाल कृष्ण गोखले की संक्षिप्त जीवनी

आधुनिक युग की आधुनिकता की होड़ में हम सब भागने में इतने व्यस्त हैं कि वास्तव में हम जीवन जीने की कला भूल चुके हैं. हम विज्ञान और फैशन की चकाचौंध में कहीं न कहीं भटक रहें हैं. मैं ये कतई नहीं कहता की आधुनिकता गलत है किन्तु इसके साथ साथ हमें हमारा कर्त्तव्य बोध भी रहे.

शायद हम भूलते जा रहे हैं अपने आदर्शों को, कर्तव्यों को, मानवता को, अपने गौरवमयी इतिहास को (हमारा इतिहास इतना महान है की इसे शब्दों में वर्णन करना मुश्किल है. अपने भविष्य को इसी तरह गौरवमयी बनाने के लिए ऐसे हजारों लाखों बलिदानियों, त्यागियों, तपस्वियों की आवश्यकता होगी इसीलिए अपने महान इतिहास को विष्मृत करना महंगा पड़ेगा) और उन किस्सों कहानियों को जो बचपन में हमारी दादी और नानी सुनाया करती थी. आप सोंच रहे होंगे कि उन अनपढ़ दादी और नानी की मामूली कहानी बच्चों में क्या प्रभाव डालेगी?

Gopal krishna gokhale in hindi language

जी हाँ! उन पढ़े लिखे लोगों को जो खुद को शिक्षित समझते हैं एक क्षण के लिए उनको उन अनपढ़ दादी और नानी की मामूली कहानी जो टूटी -फूटी भाषा में  कही जाती थी, बेकार की बातें लगती होगी किन्तु गंभीरता से इन कहानियों की गहराई में जाईये.

उन अनपढ़ दादी और नानी की मामूली कहानी जो टूटी -फूटी भाषा में कही जाती थी यकीन मानिये यही मामूली कहानी कोमल बच्चे के मन को अद्भुत उर्जा से भर देती थी, जाने – अनजाने बहुत सी ऐसी बातें सिखा जाती थी जो बड़े – बड़े शिक्षक हमें सिखाते हैं, उन कहानियों में इतिहास, धर्म, नीति, शिक्षा, ज्ञान, कल्पना लोक आदि मजेदार विषयों का मिश्रण हुआ करता था. गोखले की माँ जो पढ़ी – लिखी नहीं थी, फिर भी उन्हें ‘रामायण’ ‘महाभारत’ की अनेक कथाएं याद थीं जो वे बाल गोपाल को सुनाया करती थी.

यही बच्चों की प्रारंभिक शिक्षा होती है जो उन बच्चों का भावी – भविष्य के लिए मार्गदर्शन का काम करती थी. यह सिलसिला पीढ़ी दर पीढ़ी चलती थी जो अब टूटती जा रही है.

भारतीय इतिहास अनेकों महापुरुषों की महान गौरवमयी गाथाओं से भरी – पड़ी है. ऐसे लोग स्वयं आदर्शस्वरूप हैं. इनकी कहानियां हमारे अन्दर अनेक गुणों को पोषित करती है. ऐसे महान लोगों की त्याग, तपस्या, वीरता, बलिदान, निष्काम कर्म, ईमानदारी, भक्ति आदि के बारे में हमें जानना और समझना आवश्यक है ताकि हम उन गुणों को अपने जीवन में उतारने का प्रयास कर सकें और अपने भविष्य को यानि अपने बच्चों को इनके बारे में कुछ बता सकें.

आईये आज हम ऐसे ही महान स्वतंत्रता सेनानी, समाजसेवी, विचारक एवं सुधारक गोपाल कृष्ण गोखले के बारे में समझेंगे.

गोपाल कृष्ण गोखले : संक्षिप्त विवरणी

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नाम : गोपाल कृष्ण गोखले

जन्म : 9 मई 1866

जन्म स्थान :  रत्‍‌नागिरी कोतलुक ग्राम महाराष्ट्र भारत

पिता : कृष्णाराव गोखले

माता : वालुबाई

प्रारंभिक शिक्षा : एक स्थानीय विधालय

स्नातक की डिग्री : एल्फिन्स्टन कॉलेज मुंबई

संस्थापक : सर्वेन्ट्स ऑफ़ इंडिया सोसायटी

निधन : 19 फ़रवरी 1915

Quote of the day in hindi

भारत का ग्लेडस्टोन

महात्मा गाँधी को कौन नहीं जानता. पूरा विश्व आज उनसे प्रभावित है. हमारे ‘राष्ट्रपिता’ और ‘सत्य एवं अहिंसा के पुजारी’ महात्मा गाँधी देश विदेश के असंख्य लोगों के जीवन को प्रभावित किया, किन्तु क्या आप जानते हैं कि वे स्वयं किनसे प्रभावित थे?

वह महापुरुष थे जिनसे स्वयं महात्मा गाँधी प्रभावित थे भारत के एक स्वतंत्रता सेनानी, समाजसेवी, विचारक एवं समाज सुधारक गोपाल कृष्ण गोखले. गांधीजी उनको अपना गुरु मानते थे.

महात्मा गाँधी के राजनैतिक गुरु व प्रेरणाश्रोत गोपाल कृष्ण गोखले को वित्तीय मामलों की अद्वितीय समझ थी. इस मामले में अधिकारपूर्ण बहस करने की क्षमता के कारण उन्हें भारत का ग्लेडस्टोन कहा जाता है.

गोपाल कृष्ण गोखले का जन्म 

गोपाल कृष्ण गोखले का जन्म 9 मई 1866 को पूर्व बम्बई प्रेसीडेंसी के रत्नागिरी जिले के कोतलुक गाँव के एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था. उनके पिता श्री कृष्णराव कोल्हापुर रियासत के एक छोटे सामंती राजवाड़े में क्लर्क थे. उनकी माता वालूबाई एक साधारण महिला थी.

गोखले की प्रारंभिक शिक्षा एक स्थानीय विधालय में हुई थी. बचपन से ही वे साफगोई और ईमानदार प्रकृति के व्यक्ति थे. सन 1874 – 75 में वे आगे की शिक्षा पाने के लिए अपने बड़े भाई के साथ कोल्हापुर गये जहाँ वे पूरी तरह से पढ़ाई में निमग्न हो गये.

पिता की मृत्यु

सन 1879 में उनके पिता का देहांत हो गया. पिता की असामयिक निधन ने गोपालकृष्ण को बचपन से ही सहिष्णु और कर्मठ बना दिया. पिता के निधन के पश्चात  परिवार के पालन पोषण की समस्या खड़ी हो गयी. अन्य कोई परिवार में कमानेवाला नहीं था. ऐसी स्तिथि में गोखले के परिवार को सहारा उनके निर्धन चाचा ने दिया. गोखले का परिवार उनके साथ ताम्हनमाला चला गया.

परिवार के भरण – पोषण हेतु गोखले के बड़े भाई गोविन्द ने पढाई छोडकर नौकरी कर ली. आर्थिक रूप से कमजोर परिवार को सँभालने के लिए गोखले ने भी नौकरी करनी चाही किन्तु उनके भाई ने उन्हें आगे पढने के लिए उत्साहित किया. गोखले ने कोल्हापुर में रहकर अपनी पढाई जारी रखा.

अपने परिवार के दयनीय आर्थिक हालत का ज्ञान गोखले जी को था इसलिए वह एक पाई भी फिजुलखर्च नहीं करते थे.

गोखले का विवाह

सन 1880 में गोखले का विवाह कर दिया गया. उनकी पत्नी को कोई असाध्य रोग था अतः उनके भाई – भाभी ने उन्हें दूसरा विवाह करने के लिए दबाव डाला. न चाहते हुए भी वे अपनी पहली पत्नी से सहमती लेकर दूसरा विवाह कर लिया.

उनकी दूसरी पत्नी ने एक पुत्र और दो पुत्रियों को जन्म दिया. कहा जाता है उनके पुत्र का निधन छोटी आयु में ही हो गया. इसके बाद सन 1900 में उनकी दूसरी पत्नी का देहांत हो गया. इसके बाद गोखले ने विवाह नहीं किया. उन्होंने अपने दोनों पुत्रियों को अच्छी शिक्षा दी.

स्नातक की डीग्री

सन 1884 में में उन्होंने बम्बई (मुंबई) के एल्फिन्स्टन कॉलेज से स्तानक की डीग्री उत्तीर्ण की. उस कॉलेज में गणित के अध्यापक प्रो. हाथार्नवेट और अंग्रेजी के प्रोफेसर वडर्सवर्थ गोखले से काफी प्रभावित हुए. इसी कॉलेज से उन्होंने बी.ए. की परीक्षा द्वित्य श्रेणी से उत्तीर्ण की.

कुछ पुस्तकों को पढने पर हमें ज्ञात हुआ की बी. ए. के बाद बाद गोखले लॉ की पढाई करने का निश्चय किया और पूना के दक्कन कॉलेज में नामांकन करा लिया. किन्तु इससे पारिवारिक दायित्व पुरे नहीं हो सकते थे. इसलिए वह पूना के न्यू इंग्लिश स्कूल में सहायक अध्यापक के रूप में कार्य करने लगे.

पारिवारिक दायित्व की पूर्ति हेतु वो अध्यापन की ओर अग्रसर हुए इसी दौरान उन्होंने कानून की पहली परीक्षा पास कर ली. किन्तु परिस्थितिवस उन्हें अपनी पढाई छोडनी पड़ी.

राजनीतिक क्षेत्र में प्रवेश

इसी बीच गोखले बाल गंगाधर तिलक और आगरकर के संपर्क में आये. उनके विचारों का गहरा असर गोखले पर पड़ा. यहीं से कहा जाय तो इसके साथ ही राजनीतिक क्षेत्र में गोखले के प्रवेश का आधार तैयार हो गया.

सन 1885 में कोल्हापुर के रेजीडेंट विलियम ली वार्नर की अध्यक्षता में गोखले ने ‘ अंग्रेजी शासन के अधीन भारत’ पर एक बहुत ही जोरदार भाषण दिया. उनके इस भाषण की खूब प्रशंसा हुई.

महादेव गोविन्द रानाडे

रानाडे एक समाज सुधारक, न्यायाधीश और एक विद्वान् व्यक्ति थे. गोखले उनसे राजनीति व लोकसेवा की शिक्षा लेते रहे. उन्होंने रानाडे को अपना राजनीतिक गुरु मान लिया. वह अपने गुरु की हर बात को ध्यान से सुनते थे. यूँ कहा जा सकता है कि रानाडे उनके जीवन के आधार स्तम्भ बन गये थे.

गोखले को खेल में भी रूचि थी. बिलियर्ड्स, शतरंज, क्रिकेट आदि खेलों में भी रूचि रखते थे. इन खेलों से वह आजीवन जुड़े रहे.

कांग्रेस में कदम

सन 1889 में गोखले ने कांग्रेस में कदम रखा, लोकमान्य तिलक भी इसी वर्ष कांग्रेस में शामिल हुए. यद्दपि गोखले व तिलक के विचार भिन्न थे. उस समय देश में कई संस्थाएं काम कर रही थी, जो लोगों की शिकायतों को प्रकाश में लाने का काम करती थी. ऐसी ही एक संस्था ‘पूना एसोसिएशन’ का मंत्री गोखले को बनाया गया. यहाँ से ही गोखले की देश – सेवा की शुरुआत हुई.

इसके अतिरिक्त अन्य कार्यभार गोखले के कन्धों पर सौंपा गया जैसे अंग्रेजी त्रैमासिक पत्रिका का प्रकाशन व अन्य सम्पादन का दायित्व आदि. इस दौरान उनके मार्ग में अनेकों बाधाएं आयीं किन्तु वह विचलित हुए बिना अपने कर्तव्यों का निर्वहन ईमानदारीपूर्वक करते रहे.

अब तक वह अध्ययन व राजनीतिक जीवन के एक महत्वपूर्ण व्यक्ति बन चुके थे.

सन 1893 में उनके जीवन से माता का साया भी उठ गया था.

महात्मा गाँधी से मुलाकात

सन 1896 में गांधीजी से गोखले की पहली मुलाकात हुई. इस मुलाकात के बाद इन दोनों के बीच घनिष्ठता बढती गयी. गोखले की मातृभूमि के प्रति प्रेम और उनके विचारों से गांधीजी अत्यंत प्रभावित हुए. उन्होंने गोखले का शिष्य बनना स्वीकार कर लिया.

अपने महत्वपूर्ण कृत्यों के बाद वह इतिहास में एक सच्चे देशभक्त, अर्थशास्त्री और राजनीतिज्ञ के रूप में प्रसिद्ध हो गये. देश के आर्थिक विकास पर उन्होंने विशेष बल दिया था. समाज – सेवा और राजनीति के लिए उन्होंने अपना जीवन पूर्ण रूप से अर्पित कर दिया.

आसाधारण व्यक्तित्व

मात्र 36 वर्ष की आयु में उनके असाधारण व्यक्तित्व के कारण उनको सर्वोच्च विधान परिषद् का अध्यक्ष बना दिया गया. गोखले विभिन्न कार्यों से कई बार इंग्लैंड गये. ब्रिटिश सरकार के द्वारा भारतियों पर हो रहे अत्याचारों पर अपनी बात रखने के लिए इंग्लैंड गये जहाँ पर उन्होंने विभिन्न सभाओं को संबोधित कर सबको मंत्रमुग्ध कर दिया.

सन 1905 में अंग्रेजों के समक्ष आजादी के पक्ष में अपनी बात रखने के लिए लाला लाजपत राय के साथ इंग्लैंड गये और अपने बाद अत्यंत प्रभावपूर्ण तरीके से उनके बीच रखी.

सन 1909 के ‘मोर्ले मिन्टों सुधार’ के प्रस्तुतीकरण में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई जो बाद में एक कानून बन गया.

अथक परिश्रम और अत्यधिक बोलने के कारण देश के इस लाल को गंभीर रूप से बीमार बना दिया. और अंत में 19 फ़रवरी 1915 को उनकी मृत्यु हो गयी. किन्तु उनके बहुमूल्य विचार और आदर्श लाखों लोगों के दिलों में जीवित हैं.

श्रधान्जली : नमन वीर स्वतंत्रता सेनानी को

नमन लक्ष – लक्ष स्वतंत्रता सेनानियों को

नमन वीर बलिदानियों को

नमन माँ भारती के लाल को

नमन अमर अद्वितीय गोपाल को

जय हिन्द दोस्तों, aryavartatalk उन सभी महापुरुषों, स्वतंत्रता सेनानियों को नमन करता है जिन्होंने अपने त्याग, तपस्या, बलिदान से देश का मस्तक ऊँचा किया है. उन सभी की बलिदान के कारण ही आज हम आजादी की सांस ले पा रहे हैं. हम उन्हें भूल न जाएँ इसीलिए ऐसे मनीषियों के बारे में हम आगे भी ऐसी लेख लाते रहेंगे. तब तक के लिए धन्यबाद.

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