llp kya hai

LLP क्या होता है? LLP Full Form, registration process

Business

भारत में कंपनी रजिस्ट्रेशन के कई तरीकों में से एक प्रसिद्ध तरीका ‘Limited Liability Partnership (LLP)’ है. उद्यमियों के बीच यह संगठन काफी पसंदीदा रूप है और इसका मुख्य कारण है कि इसमें कंपनी और साझेदारी फर्म (partnership firm) दोनों का लाभ एकसाथ प्राप्त होता है. यह कैसे होता है इसके बारे में हम आगे जानेंगे.

आप यदि partnership firm के बारे में जानते हैं तो आपको बता दें कि यह परम्परागत पार्टनरशिप से भिन्न होती है. यह एक अलग क़ानूनी इकाई है, इसतरह यह व्यक्तिगत पार्टनर से अलग होता है. इसमें प्रत्येक पार्टनर्स की जिम्मेदारी सिमित है अर्थात इनका दायित्व इनके द्वारा किए गए योगदान तक ही सीमित होता है. LLP कंपनी Limited liability Partnership Act, 2008 द्वारा नियंत्रित एवं शासित है.

कम खर्च और एक आसान प्रक्रिया से गुजरकर LLP के साथ अपना व्यवसाय प्रारम्भ कर सकते हैं. न्यूनतम दो भागीदारों की संख्या के साथ इसे शुरू किया जा सकता है.

आइये विस्तारपूर्वक जानते हैं कि LLP क्या होता है? एक नई Limited Liability Partnership रजिस्ट्रेशन कैसे करें? LLP पंजीकरण के लिए आवश्यक दस्तावेज आदि.

LLP क्या होता है?

LLP का फुल फॉर्म Limited Liability Partnership (सीमित देयता भागीदारी) होता है. यह एक प्रकार की व्यावसायिक संरचना है जिसके माध्यम से भागीदार अपना व्यवसाय करते हैं. एलएलपी स्थापित करने के लिए कम से कम दो व्यक्तियों की आवश्यकता होती है.

यह व्यवसाय का वह रूप है जिसमें साझेदारी फर्म और एक कंपनी का लाभ प्राप्त होता है. इसे आप partnership और corporation दोनों का एक संयोजन के रूप में समझ सकते हैं. इसमें इन दोनों रूपों की विशेषता पायी जाती है. यह limited liability partnership act, 2008 के तहत शासित है.

ऐसे कई प्रमुख कारण हैं जिसके चलते बहुत से उद्यमी हैं जो इसके साथ जाना पसंद करते हैं जैसे इसकी स्थापना की आसान प्रक्रिया, दिन-प्रतिदिन के संचालन में तुलनात्मक रूप से कम परेशानी होना, इसके लिए कोई न्यूनतम पूंजी आवश्यकता नहीं होती है, आदि.

आमतौर पर छोटे और मध्यम उद्यम LLP के रूप में काम करते हैं. Limited Liability Partnership अर्थात सीमित देयता भागीदारी और इसके नाम से ही ज्ञात हो रहा है कि इसमें भागीदारों की सीमित देयता होती है. सीमित देयता अर्थात इसमें प्रत्येक पार्टनर्स की जिम्मेदारी उनके शेयर होल्डिंग के अनुसार ही होती है तथा इसके भागीदारों की व्यक्तिगत संपत्ति का उपयोग कंपनी के ऋणों का भुगतान करने के लिए नहीं किया जाता है.

जहाँ एक नियमित पार्टनरशिप फर्म में इसके भागीदारों की असीमित जिम्मेदारी होती है वहीँ LLP में सिमित दायित्व का लाभ प्राप्त होता है.

LLP की मुख्य विशेषताएं

  • LLP का मतलब लिमिटेड लायबिलिटी पार्टनरशिप है.
  • यह सीमित देयता भागीदारी अधिनियम 2008 द्वारा शासित है.
  • इसमें एक कंपनी के साथ-साथ एक साझेदारी फर्म का लाभ उठाने की अनुमति प्राप्त होता है.
  • इसको कंपनियों की तरह ही एक स्वतंत्र कानूनी दर्जा प्राप्त है.
  • इसके भागीदारों की कंपनी में सीमित दायित्व होती है.
  • इसके प्रत्येक सदस्य अपने स्वयं के कृत्यों के लिए उत्तरदायी है.
  • इसकी स्थापना के लिए कम से कम दो नामित भागीदार होने चाहिए जिसमें से एक भारतीय होना चाहिए.
  • इसमें भागीदारों के अधिकारों और कर्तव्यों को नियंत्रित करने के लिए भागीदारों के बीच एक समझौता होता है.

LLP पंजीकरण के लिए आवश्यक दस्तावेज

A) LLP पंजीकरण के लिए इच्छुक भागीदारों (भारतीय नागरिक) के पास निम्न आवश्यक दस्तावेज होना जरुरी है –

  • PAN Card/भागीदारों का आईडी प्रमाणपत्र
  • भागीदारों का पासपोर्ट आकार का फोटोग्राफ
  • आधार कार्ड/वोटर आईडी/ड्राइविंग लाइसेंस/पासपोर्ट
  • नवीनतम बैंक स्टेटमेंट/मोबाइल बिल/टेलीफोन बिल/बिजली बिल/गैस बिल

B) LLP पंजीकरण के लिए इच्छुक भागीदारों (विदेशी नागरिक या एनआरआई) के पास निम्न आवश्यक दस्तावेज होना जरुरी है –

  • पासपोर्ट (विदेशी नागरिकों/एनआरआई के मामले में) आवश्यक है
  • पते का प्रमाण – बैंक स्टेटमेंट/ड्राइविंग लाइसेंस/रेसिडेंस कार्ड या सरकार द्वारा जारी किया गया कोई पहचान पत्र जिसमें पता अंकित हो.

C) LLP के लिए आवश्यक दस्तावेज –

  • पंजीकृत कार्यालय का पता प्रमाणपत्र – सेल डीड, प्रॉपर्टी डीड और यदि पंजीकृत कार्यालय किराए पर लिया गया हो तो रेंट एग्रीमेंट, मकान मालिक से no-objection certificate, इसके अलावा बिजली/टेलीफोन/यूटिलिटी बिल आदि.

LLP पंजीकरण की प्रक्रिया

जैसा कि आप समझ चुके हैं कि एलएलपी स्थापित करने के लिए कम से कम दो भागीदारों की आवश्यकता होती है. इन दोनों नामित भागीदारों में कम से कम एक भागीदार भारतीय होना चाहिए. इन नामित भागीदारों के अधिकार और कर्तव्य एलएलपी समझौते द्वारा नियंत्रित होते हैं. हालांकि, इसके भागीदारों की अधिकतम संख्या की कोई ऊपरी सीमा नहीं है.

यदि आप LLP पंजीकरण कराना चाहते हैं तो आपको निम्न LLP पंजीकरण प्रक्रियाओं को पालन करना होगा –

  • डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाणपत्र (DSC) प्राप्त करें – इसके नामित भागीदार को डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाणपत्र प्राप्त करना जरुरी है क्योंकि आजकल दस्तावेज ऑनलाइन दाखिल किए जाते हैं और डिजिटल रूप से हस्ताक्षरित करने के लिए DSC आवश्यक होता है. DSC किसी भी मान्यता प्राप्त प्रमाणन एजेंसियों से प्राप्त किया जा सकता है.
  • Director Identification Number (DIN) के लिए आवेदन करें – इसके नामित भागीदार बनने के लिए DIN के लिए आवेदन करना होगा.
  • अपने व्यवसाय के लिए नाम का चयन करें – आपको एक ऐसा नाम का चयन करना चाहिए जो आपके व्यवसाय से मेल खाता हो. यदि जिस नाम के लिए आवेदन किया गया है वह स्वीकृत हो जाता है, तो यह स्वीकृत और आरक्षित नाम एलएलपी के प्रस्तावित नाम होगा. आप MCA portal पर मुफ्त नाम खोज सुविधा का उपयोग करके भी नाम खोज सकते हैं. इससे आपको ऐसे नाम चुनने में मदद मिलेगी जो पहले से मौजूद नामों से मिलते-जुलते नहीं हैं. RUN LLP फॉर्म भरकर नाम की स्वीकृति प्राप्त की जा सकती है.
  • Incorporation Certificate प्राप्त करें – आवश्यक दस्तावेजों के साथ निगमन प्रमाणपत्र प्राप्त करने के लिए आवेदन करें. जमा किये गए आवेदन का निरीक्षण और सत्यापन कंपनी के रजिस्ट्रार (ROC) करेगा और सत्यापन के बाद Incorporation Certificate जारी करेगा.
  • LLP Agreement – एलएलपी और भागीदारों के बीच आपसी अधिकारों और कर्तव्यों को निर्धारित एवं नियंत्रित करने के लिए एक एलएलपी समझौता का होना बहुत महत्वपूर्ण है. किसी विशेषज्ञ की देख-रेख में इस समझौते का मसौदा तैयार आसानी से किया जा सकता हैं. इस समझौते को स्टांप पेपर पर प्रिंट करना होता है जिसका मूल्य अलग – अलग राज्य के के हिसाब से अलग-अलग हो सकता है. आपको बता दें कि incorporation प्रोसेस हो जाने के बाद आवश्यक रूप से एलएलपी समझौता दर्ज किया जाना चाहिए. यह प्रक्रिया निगमन की तारीख से 30 दिनों के भीतर करना पड़ता है.

अन्य महत्वपूर्ण बात

दोस्तों LLP से सम्बंधित महत्वपूर्ण बातों को समझने के बाद एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह आता है कि LLP पंजीकरण करने के फायदे क्या हैं. इसका पंजीकरण का एक महत्वपूर्ण लाभ यह है कि इसमें सीमित देयता भागीदारी का लाभ प्राप्त होना अर्थात व्यवसाय में किसी भी नुकसान होने पर इसके भागीदार इसकी भरपाई के लिए व्यक्तिगत रूप से बाध्य नहीं हो सकते हैं, यह कंपनी का मामला हो जाता है. किसी भी परिस्तिथि में ऋणों की क्षतिपूर्ति के लिए LLP उत्तरदायी होगी.

ज्ञात हो कि कंपनी के सदस्यों के आपसी निर्णय पर और एलएलपी समझौते द्वारा इसका संचालन होता है जिसके कारण कंपनी में बेहतर लचीलापन आता है. न्यूनतम अनुपालन, कम निगमन लागत, कंपनी के रूप में इसका एक शाश्वत अस्तित्व आदि लाभ इसमें मिलता है.

Lal Anant Nath Shahdeo

मैं इस हिंदी ब्लॉग का संस्थापक हूँ जहाँ मैं नियमित रूप से अपने पाठकों के लिए उपयोगी जानकारी प्रस्तुत करता हूँ. मैं अपनी शिक्षा की बात करूँ तो मैंने Accounts Hons. (B.Com) किया हुआ है और मैं पेशे से एक Accountant भी रहा हूँ.

https://www.aryavartatalk.com

Leave a Reply

Your email address will not be published.